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पिता की घडी बेचकर सपनों को साकर करने निकले थे जुबली कुमार
Thursday, Jul 11 2019
 

मुम्बई 11 जुलाई बॉलीवुड में जुबली कुमार के नाम से मशहूर राजेन्द्र कुमार ने कई सुपरहिट फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया लेकिन उन्हें अपने करियर के शुरूआती दौर में कडा संघर्ष करना पडा था। पंजाब के सियालकोट शहर में 20 जुलाई 1929 को एक मध्यम वर्गीय परिवार मे जन्में राजेन्द्र कुमार अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे। जब वह अपने सपनों को साकार करने के लिये मुम्बई पहुंचे थे तो उनके पास मात्र पचास रुपये थे जो उन्होंने अपने पिता से मिली घडी बेचकर हासिल किए थे। घडी बेचने से उन्हें 63 रुपये मिले थे. जिसमें से 13 रुपये से उन्होंने फ्रंटियर मेल का टिकट खरीदा । मुंबई पहुंचने पर गीतकार राजेन्द्र कृष्ण की मदद से राजेन्द्र कुमार को 150 रुपये मासिक वेतन पर निर्माता. निर्देशक एच.एस. रवैल के सहायक निर्देशक के तौर पर काम करने का अवसर मिला। वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म ..जोगन ..में राजेन्द्र कुमार को काम करने का अवसर मिला। इस फिल्म में उनके साथ दिलीप कुमार ने मुख्य भूमिका निभायी थी। वर्ष 1950 से वर्ष 1957 तक राजेन्द्र कुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिये संघर्ष करते रहे। फिल्म.जोगन..के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गये। इस बीच उन्होंने तूफान और दीया तथा.आवाज.एक झलक जैसी कई फिल्मों मे अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बाक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुयी। वर्ष 1957 मे प्रदर्शित महबूब खान की फिल्म उन्हें बतौर पारश्रमिक 1000 रूपये महीना मिला।यह फिल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर आधारित थी बावजूद इसके राजेन्द्र कुमार ने अपनी छोटी सी भूमिका के जरिये दर्शकों का मन मोह लिया। इसके बाद गूंज उठी शहनाई.कानून.ससुराल. घराना. आस का पंछी और दिल एक मंदिर जैसी फिल्मों मे मिली कामयाबी के जरिये राजेन्द्र कुमार दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुये ऐसी स्थिति में पहुंच गये जहां वह फिल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1959 मे प्रदर्शित विजय भट्ट की संगीतमय फिल्म गूंज उठी शहनाई बतौर अभिनेता राजेन्द्र कुमार के सिने कैरियर की सबसे पहली हिट साबित हुयी। वहीं वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म मेरे महबूब की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राजेन्द्र कुमार शोहरत की बुंलदियो पर जा पहुंचे। राजेन्द्र कुमार कभी भी किसी खास इमेज में नहीं बंधे। इसलिये अपनी इन फिल्मों की कामयाबी के बाद भी उन्होंने वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म .संगम. में राजकपूर के सहनायक की भूमिका स्वीकार कर ली जो उनके फिल्मी चरित्र से मेल नहीं खाती थी। इसके बावजूद राजेन्द्र कुमार यहां भी दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे।

 
 
   
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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