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कचरा कलेक्शन गाड़ियों में बदला सांग- सबकी मेहनत का ये फल है...
08/03/2019 02:33:52
 

इंदौर, 8 मार्च हमारे शहर ने तीसरी बार देश के सबसे स्वच्छ शहर का अवॉर्ड पाया है। इसके पीछे सारे शहरवासियों की मेहनत है। इंदौर नगर निगम की डोर टू डोर कचरा कलेक्शन गाड़ियों में गाना बदल गया है। आज से हैट्रिक लगाएंगे कि जगह... सबकी मेहनत का ये फल है, इंदौर नंबर वन है गाना... बजने लगा है।


सफाई के मामले में इंदौर दूसरे शहरों से तीन साल आगे

लगातार तीसरी बार सफाई का सरताज बनकर इंदौर ने साबित कर चुका है कि दूसरे शहर चाहे कितनी भी कोशिशें कर लें, इंदौर से आगे होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इंदौर दूसरे शहरों से सफाई के मामले में तीन साल आगे चल रहा है। हर साल स्वच्छता के नए लक्ष्य तय कर बेध रहा है। अब इस साल नगर निगम ने शहर की नदियों की सफाई पर हो हल्ला मचाने की तैयारी कर ली है।


दूसरे स्थान पर रहे अहमदाबाद नगर निगम के अफसर भी 10 महीने पहले ही इंदौर आए थे। उन्होंने सारा सिस्टम समझा और उसे अपने यहां अमल में लाने की कोशिश की। वहां डोर टू डोर कचरा कलेक्शन प्रभावी रूप से शुरू कर पूरे शहर से कचरा पेटियां हटाईं। हालांकि जिस गति से इंदौरवासियों ने अलग-अलग कचरा देने में सहभागिता दिखाई, वैसा वहां नहीं हो सका। देश के दूसरे कई शहर के नगर निगमों ने भी इंदौर का सिस्टम बारीकी से समझा, लेकिन उसे जमीन पर नहीं उतार सके।

हमारे आगे होने की ये हैं तीन वजह


-दूसरी बार स्वच्छता में नंबर वन आने के बाद नगर निगम ने कचरे का उत्पादन कम करने पर फोकस किया और शहरवासियों से घर में ही कचरे से खाद बनाने की अपील की। सालभर में तीस हजार परिवारों ने इसे अपनाया और अब वे कचरे से खाद तैयार कर घर की हरियाली बढ़ा रहे हैं।

-पहले देवगुराड़िया के पास से गुजरते समय लोगों को नाक पर रूमाल रखकर चलना पड़ता था, लेकिन अब ट्रेंचिंग ग्राउंड में बैठकर ही भोजन कर सकते हैं। डेढ़ वर्ष की लगातार मेहनत से कचरे के पहाड़ों को बगीचे का रूप देकर बदलने का काम भी दूसरे शहर इतनी तेजी से नहीं कर पाए। अंबिकापुर ने जरूर कचरे के निपटान को प्रभावी बनाया लेकिन डोर टू डोर और कचरा सेग्रिगेशन वहां भी प्रभावी रूप से नहीं लागू हो सका।

 


-टीम वर्क और शहरवासियों की सहभागिता का तालमेल जैसा इंदौर में है, वैसा दूसरे शहरों में नहीं दिखता। एक बार सफाई होने के बाद शहर को लोग गंदा नहीं करते हैं। ऐसे में दूसरे दिन जब वहां सफाई की जाती है तो सफाईकर्मियों को समय कम लगता है। इससे वे कम समय में ज्यादा एरिया साफ कर लेते हैं। कुल मिलाकर लोगों ने शहर को साफ रखना सीख लिया है।

चार घंटे में दो हजार किलोमीटर की दूरी तय कर उठ जाता है शहर का कचरा


शहर में सड़कों का नेटवर्क दो हजार किलोमीटर है। सुबह 7 से 11 बजे तक गाड़ियां इन सड़कों पर कचरा संग्रहित करने निकलती हैं और चार घंटे में 1100 से 1200 टन कचरा एकत्र कर ट्रांसफर स्टेशनों पर पहुंच जाता है।

साफ हो गया शहर, अब ज्यादा सुंदर होना है


शहर में सफाई का सिस्टम विकसित हो चुका है। अब हमें और ज्यादा सुंदर होना है। वॉल पेंटिंग से शहर की सुंदरता निखर गई है। अब उस सुंदरता को छोटी-छोटी बस्तियों तक ले जाना है। कंसल्टेंट श्रीगोपाल जगताप बताते हैं कि अब कचरे के कम उत्पादन को और प्रभावी बनाना है।

ये होना बाकी

-सड़कों पर पान की पीक थूकने की आदत शहरवासियों को बदलना होगी।

-फिलहाल 30 हजार घरों में कचरे से खाद बनती है, एक लाख से ज्यादा घरों में यह लक्ष्य पूरा करना होगा।

-ई-वेस्ट के लिए अभी तक शहर में ठोस काम नहीं हुआ है। पुराने कम्प्यूटर, फ्रिज, वाहन जैसे कबाड़ के सही निपटान के लिए सरकार के स्तर पर कोई व्यवस्था नहीं है।

-कचरे से बिजली का उत्पादन अभी तक शुरू नहीं हो पाया। कुछ शहरों में कचरे से बिजली उत्पन्न हो रही है।

सफाई का खर्च कम हो

सफाई  व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए जो खर्च होता है, उसे जनभागीदारी से ही कम किया जा सकता है। लोग कम से कम प्लास्टिक का उपयोग करें। कचरे से खाद बने तो ट्रेंचिंग ग्राउंड तक कचरा ले जाने में जो परिवहन व्यय होता है, वह काफी कम किया जा सकता है। -असद वारसी, सलाहकार, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट, नगर निगम

 
 
   
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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