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आपकी लाइफ से भी जुड़ी ये कहानी, इस परिवार से सीखो कैसे जीते हैं जिंदगी
11/03/2019 02:11:25
 


इंदौर, 11 मार्च समय से तेज भागते और हांफते शहर। आपाधापी भरी जिंदगी। दुष्प्रभाव से हर शहरी वाकिफ है। लेकिन दोनों हाथों में लड्डू नहीं मिलता। अंतत: प्राथमिकता तय करनी पड़ती है। सेहत या दौलत? आपाधापी या शांति? इंदौर के इस दंपती ने दूसरा विकल्प चुना। बीते बरस से वे बच्चों सहित जंगल के बीच आशियाना बना रह रहे हैं। उन्होंने सेहत और सुकून की खातिर शहर की उस सुविधा संपन्न् जिंदगी को छोड़ने का रिस्क लिया, जो दूसरों को सोचने पर मजबूर करता है।

ये एक ऐसे माता-पिता की कहानी है जो क्वालिटी लाइफ व बच्चों को प्रकृति के बीच बड़ा करने के लिए पेंच (मप्र) के जंगलों में बस गए हैं। नौकरी से लेकर आधुनिक सुख-सुविधाओं को दरकिनार किया। अब घने जंगलों के बीच रंगबिरंगी तितलियां पकड़ते, चिड़िया व जानवरों की आवाजें सुनते, मौसम संग बदलते जंगलों की रंगत महसूस करते 4 साल का बेटा व 4 महीने की बेटी बड़ी हो रही है। इंदौर में पली-बढ़ी हर्षिता शाकल्य ने लंदन से एमबीए के बाद कार्पोरेट में नौकरी की और पति के साथ इंदौर में ही अपनी बेकरी एंड ब्रांड कंसल्टिंग फर्म स्थापित की। दोनों का बिजनेस बहुत अच्छा चल रहा था।


व्यस्तता इतनी थी कि वीकेंड्स में भी काम पर निकल जाते थे। इसी बीच हर्षिता के बेटे कैजल ने जन्म लिया। उस समय भी वो काम की व्यस्तता के चलते बच्चे को समय न दे पाने को लेकर दुखी रहती थीं। मन ही मन सोच लिया था कि अब अफरा-तफरी वाली जिंदगी नहीं जीना है। इसी बीच किसी ने बताया कि पेंच राष्ट्रीय पार्क के पास गांव में बने एक रिसोर्ट में पढ़े-लिखे सहायक की जरूरत है। बिजनेस बंद कर बेटे को लेकर चल दिए जंगलों की ओर। आज हम और बच्चे इस जंगल में भरपूर जिंदगी जी रहे हैं।


इस तरह दे रहे शिक्षा...

बच्चे को हर्षिता होम स्कूलिंग दे रही हैं। सिर्फ पढ़ाई ही नहीं वो संगीत, योग, कुकिंग, फार्मिंग और दूसरी एक्टिविटीज भी सीखता है। बिना स्कूल जाए बेटा फैजल हिंदी व अंग्रेजी अच्छे से बोल लेता है। इसके अलावा गांव के लोगों के साथ रहकर उसने उनकी भाषा भी सीख ली है।


अस्पताल की जरूरत नहीं...

हर्षिता कहती हैं जब हम शहर की जिंदगी जी रहे थे तो धूल, धुआं और प्रदूषण की वजह से एलर्जी और उससे सर्दी, जुकाम की समस्या अक्सर रहती थी। यहां पर प्रदूषण बिलकुल नहीं है। शुद्ध हवा में घूमते हैं। मौसमी फल, सब्जियां, जैविक अन्न् खाते हैं तो किसी तरह की बीमारी नहीं होती। बच्चे भी यहां बिलकुल स्वस्थ हैं।


जीने की राह ये भी...


जंगल में नजदीकी रिसोर्ट में नौकरी के अलावा हर्षिता यहां की महिलाओं संग अचार, जैम और कई सामान बनाती हैं। इनकी ब्रांडिंग और मार्केटिंग कर खुद को और महिलाओं को आर्थिक मदद दे रही हैं। स्थानीय कारीगरों के बांस व मिट्टी के बर्तनों को भी बाहर भेजने में मदद करती हैं।

कमाई कम तो खर्च भी सीमित...

हर्षिता और आदित्य कहते हैं, यहां आने से कमाई 10 गुना तक घट गई लेकिन हमें इसका कोई दुख नहीं है क्योंकि उस कमाई के लिए हम जो दे रहे थे उसकी भरपाई बाद में नहीं हो पाती। आज हम दोनों एक-दूसरे को और अपने बच्चों को अपना भरपूर समय दे पा रहे हैं। कमाई कम है तो खर्चे भी कम हैं इसलिए परेशानी नहीं होती।

 

 
 
   
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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